Bharat Ki Suraksha Ranniti Kya Hai - By Rashmi Bajpai

भारत की सुरक्षा रणनीति का उद्देश्य: रक्षा भयादोहन और वैश्विक भागीदारी

दोस्तों, आज के इस लेख में हम आपको प्रोफ़ेसर प्रशान्त अग्रवाल और रश्मि बाजपेई के द्वारा सम्पादित पुस्तक “भारत की सुरक्षा रणनीति का उद्देश्य: रक्षा भयादोहन और वैश्विक भागीदारी” के बारे में जानकारी देने की कोशिश करेंगे। इस पुस्तक में भारत की सुरक्षा रणनीति के बारे में विस्तार से बताया गया है। यदि आप इसे विस्तार से जानने के इच्छुक हैं तो आप इस लेख के अंत में दिए गए लिंक से यह पुस्तक ऑनलाइन मंगवा सकते हैं।

पुस्तक के बारे में

यह पुस्तक भारतीय राष्ट्र-राज्य की यात्रा और उसकी सुरक्षा रणनीति के विकास को गहरे और विस्तार से समझने का प्रयास करती है। भारतीय राजनीतिक नेतृत्व ने समय के साथ यह समझा है कि देश की सुरक्षा केवल बाहरी खतरे से निपटने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक समग्र प्रक्रिया है जिसमें राजनीति, संस्कृति, सामरिक और सैन्य रणनीतियाँ, और वैश्विक भागीदारी सभी अहम भूमिका निभाते हैं।

पुस्तक की शुरुआत भारतीय सुरक्षा के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से होती है, जहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि भारत का प्रारंभिक सुरक्षा दृष्टिकोण रक्षात्मक था और एक पिछड़ी हुई रक्षा स्थिति में था। देश का सैन्य ढांचा, सामरिक संस्कृति, और सेना की भूमिका पहले ऐसी नहीं थी जो पूरी तरह से सशक्त और सक्षम होती। लेकिन समय के साथ, भारतीय नेतृत्व ने इस रक्षात्मक मानसिकता से बाहर निकलते हुए एक सक्रिय और सामर्थ्यपूर्ण सुरक्षा रणनीति को अपनाया।

यह यात्रा केवल सैन्य ताकत के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ ही राजनीतिक इच्छाशक्ति और रक्षा सिद्धांतों के विकास की भी कहानी है। भारतीय नेतृत्व ने समय-समय पर यह समझा कि केवल सैन्य शक्ति का निर्माण पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके साथ-साथ वैश्विक स्तर पर अपनी भूमिका और स्थिति को भी सशक्त बनाना आवश्यक है। इस दृष्टिकोण से, भारतीय सुरक्षा रणनीति को एक सिद्धांत के रूप में देखा गया है, जो रक्षा की जरूरतों से कहीं अधिक व्यापक है, जिसमें वैश्विक सुरक्षा, रणनीतिक साझेदारी, और रक्षा उद्योग का भी महत्वपूर्ण स्थान है।

भारत ने यह समझा कि रक्षा केवल “कांटेक्ट वॉरफेयर” (संघर्ष) और “न्यूक्लियर थ्रेट” तक ही सीमित नहीं रह सकती। इसके बजाय, सुरक्षा रणनीति में सामरिक, गैर-रणनीतिक, और गैर-पारंपरिक पहलुओं को भी शामिल किया गया। विशेष रूप से, वैश्विक सुरक्षा मंच पर भारत की भागीदारी और रक्षा कूटनीति को महत्वपूर्ण माना गया। पुस्तक इस बदलाव को विस्तार से समझाती है, जिसमें यह बताया गया है कि भारत ने किस तरह से अपने आंतरिक रक्षा तंत्र को सशक्त किया और बाहरी खतरों के खिलाफ एक मजबूत सुरक्षा तंत्र तैयार किया। इसके साथ-साथ भारत ने वैश्विक सुरक्षा मुद्दों पर अपनी भागीदारी को भी महत्वपूर्ण समझा, जैसे कि अंतरराष्ट्रीय शांति स्थापना मिशन, सामरिक साझेदारियाँ, और आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में सक्रिय भूमिका।

इस पुस्तक का शीर्षक “भारत की सुरक्षा रणनीति का उद्देश्य: रक्षा भयादोहन और वैश्विक भागीदारी” इस बदलाव और विस्तार को अभिव्यक्त करता है। यह शीर्षक केवल सैन्य ताकत और वैश्विक भागीदारी के बीच के संबंध को ही नहीं, बल्कि इन दोनों के बीच संतुलन को भी दर्शाता है। इस पुस्तक में यह स्पष्ट किया गया है कि भारत की सुरक्षा नीति केवल अपनी सीमाओं की रक्षा करने के लिए नहीं, बल्कि समग्र वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था में भारत की भूमिका को सुनिश्चित करने के लिए विकसित की गई है।

पुस्तक का उद्देश्य यह भी है कि यह उन विवादों और जटिलताओं को समझने में मदद करे जो भारतीय सुरक्षा नीति के निर्माण में सामने आई हैं। ये विवाद केवल सैन्य या राजनीतिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, इतिहास और भूगोल के संदर्भ में भी उत्पन्न हुए हैं। इसके अतिरिक्त, पुस्तक यह भी इंगीत करती है कि भारतीय सुरक्षा दृष्टिकोण एक परिपक्व और विकसित चरण में पहुँच चुका है, और यह भविष्य में और भी विकसित होने की क्षमता रखता है, खासकर उस युग में जब सूचना प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे नवीनतम तकनीकी विकास का महत्व बढ़ रहा है।

भारत की सैन्य संस्कृति और रक्षा नीति को समझने में यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण संदर्भ दस्तावेज के रूप में कार्य करेगी, जो न केवल इतिहास और वर्तमान को समझने में सहायक होगी, बल्कि आने वाले समय में वैश्विक रक्षा और सुरक्षा परिदृश्य में भारत की भूमिका को भी परिभाषित करने में मदद करेगी।

भारत की रक्षा नीति को यह पुस्तक केवल एक सैन्य परिप्रेक्ष्य से नहीं, बल्कि एक समग्र वैश्विक दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करती है, जहाँ सुरक्षा का मतलब केवल राज्य की रक्षा नहीं है, बल्कि राज्य के भीतर और बाहर सामरिक और राजनीतिक परिपक्वता का निर्माण भी है। यह पुस्तक न केवल भारत की सामरिक संस्कृति की यात्रा को समझाती है, बल्कि उस यात्रा के भीतर आने वाले नए अवसरों और चुनौतियों का भी विस्तार से विश्लेषण करती है।

संपादक

इस पुस्तक का सम्पादन प्रोफ़ेसर प्रशान्त अग्रवाल और रश्मि बाजपेई के द्वारा किया गया है।

प्रो. प्रशांत अग्रवाल ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के रक्षा एवं स्त्रातेजिक अध्ययन विभाग से Doctor of Philosophy (PhD) की उपाधि प्राप्त की है। डॉ. अग्रवाल विज्ञानं एवं प्रौद्योगिकी और राष्ट्रीय सुरक्षा तथा दक्षिण एशियाई मामलों के विशेषज्ञ हैं। Dr. Prashant Agrawal संयुक्त राज्य सूचना एजेंसी (USAI), नई दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय आगन्तुक कार्यक्रम के फेलो तथा शांति, सुरक्षा एवं विकास अध्ययन सोसायटी के निदेशक थे। Prof. Prashant Agrawal ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, भारतीय सामाजिक अनुसंधान परिषद् और भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद् द्वारा अनुदानित कई परियोजनाओं को पूरा किया है। इन्होने विभिन्न शैक्षणिक और अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध एवं सुरक्षा पत्रिकाओं में कई शोध लेखों का योगदान दिया है। ‘India’s Nuclear Policy: Plans and Development तथा South Asia: Peace, Security and Development‘ दो पुस्तकें भी लिखीं हैं। इसके साथ ही ‘भारतीय युद्ध कला‘ पुस्तक पर सहलेखन भी किया है

रश्मि बाजपेई इलाहाबाद विश्वविद्यालय के रक्षा एवं सामरिक अध्ययन विभाग में शोध कर रहीं हैं। पूर्वोत्तर भारत के सन्दर्भ में इनकी विशेष रूचि है। इनके कई शोध-पत्राग्रंथ समूह में प्रकाशित हो चुके हैं। Rashmi Bajpai ने राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में शोध-पत्र भी प्रस्तुत किए हैं।

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